चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में अंग प्रत्यारोपण को लेकर एक ऐसी सफलता सामने आई है, जो आने वाले वर्षों में लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकती है। अमेरिका में एक मरीज के शरीर में जेनेटिक रूप से संशोधित सुअर की किडनी प्रत्यारोपित की गई और यह किडनी करीब 9 महीने यानी 271 दिनों तक काम करती रही। इसके बाद मरीज को मानव डोनर की किडनी मिल गई और उसका प्रत्यारोपण भी सफल रहा। यह मामला इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार किसी मरीज में सुअर की किडनी को एक तरह के “ब्रिज” यानी मानव किडनी मिलने तक अस्थायी सहारे के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना मजबूत हुई है।
सुअर की किडनी इंसान में क्यों लगाई गई?
दुनिया भर में किडनी फेलियर के मरीजों की संख्या बहुत अधिक है और मानव डोनर किडनी की उपलब्धता उनकी जरूरत के मुकाबले काफी कम है। कई मरीजों को वर्षों तक ट्रांसप्लांट का इंतजार करना पड़ता है और इस दौरान उन्हें नियमित डायलिसिस पर निर्भर रहना पड़ता है।
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए वैज्ञानिक xenotransplantation पर काम कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति के शरीर में प्रत्यारोपित करना। सुअर की किडनी इस क्षेत्र में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उसका आकार और शरीर की कई जैविक विशेषताएं इंसानों से काफी मिलती-जुलती हैं।
किडनी को सीधे सुअर से इंसान में नहीं लगाया गया
यह समझना जरूरी है कि वैज्ञानिकों ने किसी सामान्य सुअर की किडनी निकालकर सीधे इंसान में नहीं लगाई थी। इसके बजाय जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से विशेष रूप से तैयार किए गए सुअर की किडनी का इस्तेमाल किया गया।
इस किडनी के जीन में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए थे ताकि मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसे आसानी से “विदेशी अंग” समझकर नष्ट न कर दे। eGenesis द्वारा विकसित इस तरह के अंगों में कई जीनोमिक बदलाव किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को कम करना और कुछ संभावित वायरस संबंधी जोखिमों को नियंत्रित करना है।
मरीज Tim Andrews के मामले ने क्यों चौंकाया?
ताजा रिपोर्ट के अनुसार Tim Andrews, 66 वर्षीय अमेरिकी मरीज, गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे थे। उनके लिए सामान्य मानव डोनर किडनी मिलने की संभावना भी बहुत कम थी। ऐसे हालात में उन्होंने प्रयोगात्मक xenotransplantation प्रक्रिया को स्वीकार किया।
उनके शरीर में जेनेटिक रूप से संशोधित सुअर की किडनी लगाई गई। प्रत्यारोपण के बाद किडनी ने काम करना शुरू किया और मरीज को डायलिसिस से छुटकारा मिला। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि यह किडनी लगभग 271 दिनों तक मरीज के शरीर में काम करती रही।
इसके बाद मरीज को मानव किडनी मिली
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि सुअर की किडनी को स्थायी रूप से रखने के बजाय वह मरीज के लिए मानव किडनी मिलने तक एक अस्थायी समाधान साबित हुई।
लगभग नौ महीने बाद सुअर की किडनी को हटा दिया गया और उसके बाद मरीज को मानव डोनर की किडनी प्रत्यारोपित की गई। रिपोर्टों के अनुसार मानव किडनी का प्रत्यारोपण सफल रहा और मरीज की स्थिति अच्छी रही। इसने वैज्ञानिकों को यह सोचने का आधार दिया है कि भविष्य में ऐसे अंग उन मरीजों के लिए “ब्रिज” बन सकते हैं जिन्हें मानव डोनर का इंतजार करना पड़ता है।
सबसे बड़ी चुनौती है शरीर का प्रतिरोध
सुअर की किडनी को इंसान में लगाने की सबसे बड़ी समस्या immune rejection यानी प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा अंग को अस्वीकार करना है। मानव शरीर किसी दूसरे जीव के अंग को विदेशी समझकर उस पर हमला कर सकता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक सुअर के DNA में बदलाव कर रहे हैं। कुछ ऐसे जीन हटाए या बदले जाते हैं जो मानव प्रतिरक्षा प्रणाली की तेज प्रतिक्रिया का कारण बन सकते हैं, जबकि कुछ मानव जीन जोड़े जाते हैं ताकि अंग मानव शरीर के साथ ज्यादा अनुकूल तरीके से काम कर सके। इसके अलावा सुअर के जीनोम में मौजूद कुछ संभावित वायरस संबंधी जोखिमों को भी कम करने का प्रयास किया जाता है।
क्या अब हर मरीज को सुअर की किडनी मिल सकेगी?
अभी ऐसा नहीं है। यह तकनीक बेहद आशाजनक है, लेकिन इसे अभी प्रयोगात्मक चिकित्सा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। शुरुआती सफलताओं के बावजूद वैज्ञानिकों को यह साबित करना होगा कि ऐसे अंग लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी तरीके से काम कर सकते हैं।
अमेरिका में जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी के क्लिनिकल ट्रायल शुरू हो चुके हैं। NYU Langone Health ने नवंबर 2025 में ऐसे क्लिनिकल ट्रायल में पहली सर्जरी की जानकारी दी थी।
इस तकनीक से दुनिया को क्या फायदा हो सकता है?
अगर वैज्ञानिक इस तकनीक को सुरक्षित और भरोसेमंद बना लेते हैं तो इसका सबसे बड़ा फायदा मानव अंगों की कमी को दूर करने में हो सकता है। वर्तमान में हजारों मरीज किडनी ट्रांसप्लांट के इंतजार में रहते हैं और कई मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना पड़ता है।
भविष्य में विशेष रूप से तैयार किए गए सुअरों से बड़ी संख्या में किडनी उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे मरीजों को वर्षों तक डोनर का इंतजार करने की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि इसके लिए बड़े और लंबे समय तक चलने वाले क्लिनिकल ट्रायल जरूरी होंगे।
क्या सुअर की किडनी इंसानी किडनी की जगह पूरी तरह ले सकती है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिकों ने निश्चित रूप से बड़ी प्रगति की है, लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी लंबे समय तक मानव किडनी की तरह सुरक्षित और स्थायी रूप से काम कर सकती है।
वैज्ञानिकों के सामने इम्यून रिजेक्शन, संक्रमण, लंबे समय तक अंग के काम करने और मरीज की सुरक्षा जैसी कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए इस तकनीक को आम मरीजों के लिए उपलब्ध होने में अभी समय लग सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि व्यापक इस्तेमाल से पहले कई वर्षों के शोध और क्लिनिकल परीक्षण की जरूरत पड़ सकती है।
चिकित्सा विज्ञान के लिए क्यों है यह ऐतिहासिक उपलब्धि?
सुअर से इंसान में किडनी प्रत्यारोपण का यह क्षेत्र अब प्रयोगशाला और पशु-अध्ययनों से आगे बढ़कर जीवित मानव मरीजों के क्लिनिकल परीक्षण तक पहुंच चुका है। मार्च 2024 में Massachusetts General Hospital में Richard Slayman को पहली बार जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी जीवित मानव मरीज में प्रत्यारोपित की गई थी।
इसके बाद कई अन्य मरीजों में भी ऐसे प्रयोग हुए। Tim Andrews का लगभग नौ महीने तक सुअर की किडनी के साथ रहना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि बाद में उन्हें मानव किडनी भी सफलतापूर्वक मिल सकी।
भविष्य में क्या होगा?
वैज्ञानिक अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी को मरीज के शरीर में एक साल या उससे भी अधिक समय तक सुरक्षित रूप से चलाया जा सकता है। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि किस प्रकार के मरीज इस तकनीक के लिए सबसे उपयुक्त होंगे।
यदि आने वाले क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं तो xenotransplantation किडनी ट्रांसप्लांट की दुनिया को पूरी तरह बदल सकता है। ऐसा भविष्य संभव हो सकता है जिसमें किसी मरीज को मानव डोनर का इंतजार करते हुए वर्षों तक डायलिसिस पर निर्भर न रहना पड़े।
निष्कर्ष
इंसान में जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी का सफल इस्तेमाल चिकित्सा विज्ञान की एक असाधारण उपलब्धि है। करीब 271 दिनों तक किडनी का काम करना और उसके बाद मरीज का सफल मानव किडनी ट्रांसप्लांट कराना इस तकनीक की संभावनाओं को मजबूत करता है।
हालांकि अभी इसे मानव किडनी का तैयार विकल्प नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर आगे के क्लिनिकल ट्रायल सफल होते हैं, तो सुअर से प्राप्त किडनी भविष्य में उन लाखों मरीजों के लिए जीवन बचाने वाला विकल्प बन सकती है जिन्हें आज डोनर किडनी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।
नोट: यह लेख उपलब्ध ताजा वैज्ञानिक और समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। Xenotransplantation अभी विकास और क्लिनिकल परीक्षण के चरण में है; इसे सामान्य चिकित्सा उपचार के रूप में उपलब्ध नहीं माना जाना चाहिए।


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