जग खबर

जग खबर एक प्रमुख हिंदी समाचार वेबसाइट है, जो देश-विदेश की ताज़ा खबरों, राजनीति, मनोरंजन, खेल, व्यापार, टेक्नोलॉजी और सामाजिक मुद्दों पर समग्र कवरेज प्रदान करती है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और तेज़ खबरें पहुँचाना है, जिससे वे हर महत्वपूर्ण घटना से अपडेट रह सकें।

विदेशी सहायता में कटौती और युद्ध पर खर्च—क्या यह सही प्राथमिकता है?

वॉशिंगटन: अमेरिका ने अपनी विदेशी सहायता नीति में बड़ा बदलाव करते हुए अंतरराष्ट्रीय सहायता कार्यक्रमों और एजेंसियों को मिलने वाली फंडिंग में भारी कटौती की है। इस फैसले का असर स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, कुपोषण, शरणार्थी सहायता और विकास से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों पर पड़ रहा है। अमेरिका लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी सहायता दाता रहा है, इसलिए उसकी इस नीति का प्रभाव वैश्विक स्तर पर दिखाई दे रहा है।

अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, विदेशों में खर्च किए जाने वाले धन को अमेरिकी राष्ट्रीय हितों और “America First” नीति के अनुरूप इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विदेशी सहायता कार्यक्रमों की समीक्षा की गई और कई कार्यक्रमों की फंडिंग को कम या समाप्त किया गया। सरकार का कहना है कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल उन कार्यक्रमों में होना चाहिए जिनसे अमेरिका की सुरक्षा और रणनीतिक प्राथमिकताओं को लाभ मिले।

अमेरिकी सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जब गरीब और युद्धग्रस्त देशों में स्वास्थ्य, भोजन और मानवीय सहायता के लिए धन की कमी हो रही है, तब मध्य पूर्व में चल रहे सैन्य संघर्ष पर इतना बड़ा खर्च क्यों किया जा रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, ईरान के साथ युद्ध पर जुलाई 2026 तक अमेरिका का खर्च लगभग 37.5 अरब डॉलर पहुंच चुका था। दूसरी ओर, अमेरिकी विदेशी सहायता वित्त वर्ष 2025 में घटकर लगभग 47.3 अरब डॉलर रह गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम थी।

अमेरिकी सहायता का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य और मानवीय कार्यक्रमों में इस्तेमाल होता रहा है। इनमें HIV/AIDS से लड़ने, बच्चों के पोषण, खाद्य सहायता, स्वच्छ पानी, आपदा राहत, शरणार्थियों की मदद और गरीब देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। फंडिंग कम होने के कारण कई सहायता संगठनों को अपने कार्यक्रम सीमित करने, कर्मचारियों की संख्या घटाने और कुछ परियोजनाओं को बंद करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

इस बदलाव का असर अफ्रीका के कई देशों में विशेष रूप से देखा जा रहा है। सोमालिया जैसे देशों में कुपोषण और खाद्य संकट से निपटने के लिए उपलब्ध सहायता में बड़ी कमी आई है। ऐसे समय में जब कई क्षेत्रों में सूखा, संघर्ष और खाद्य असुरक्षा जैसी समस्याएं पहले से मौजूद हैं, सहायता में कमी ने मानवीय संगठनों की चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिकी फंडिंग में कमी का असर संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों पर भी पड़ रहा है। ये संगठन दुनिया के युद्धग्रस्त और गरीब क्षेत्रों में भोजन, स्वास्थ्य सेवाएं, शरणार्थी सहायता और आपातकालीन राहत पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अमेरिकी सहायता कम होने के बाद इन संगठनों को दूसरे देशों और दानदाताओं से अतिरिक्त वित्तीय मदद जुटाने की आवश्यकता पड़ रही है।

यह स्थिति एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देती है—क्या युद्ध और सैन्य अभियानों पर खर्च होने वाले अरबों डॉलर का कुछ हिस्सा मानवीय सहायता, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और विकास कार्यक्रमों में लगाया जा सकता था? यह केवल अमेरिका का घरेलू राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव उन देशों तक भी पहुंचता है जो पहले से ही आर्थिक और मानवीय संकट से गुजर रहे हैं।

मध्य पूर्व का संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मामला नहीं रह गया है। तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर इसके प्रभाव के कारण दुनिया के दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं। IMF ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा आयात पर निर्भर और आर्थिक रूप से कमजोर देशों को ऐसे झटकों का सबसे अधिक खतरा है।

विशेष चिंता Strait of Hormuz को लेकर है, क्योंकि यह दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है। यहां लंबे समय तक व्यवधान होने से तेल और ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर परिवहन, खाद्य पदार्थों, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। सितंबर 2026 की ताजा रिपोर्टों में अमेरिका में डीजल और पेट्रोल की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

ऐसे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या “America First” नीति वास्तव में अमेरिका को आर्थिक रूप से मजबूत कर रही है, या लंबे सैन्य संघर्ष, बढ़ता सरकारी कर्ज और महंगा ईंधन अंततः अमेरिकी जनता पर भी अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं? Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है और ईरान युद्ध तथा बढ़ती borrowing costs ने वित्तीय दबाव को और बढ़ाया है।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि युद्ध की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी केवल ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर डालना उचित नहीं होगा। मध्य पूर्व में लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक तनाव, ईरान की नीतियां, क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका और वैश्विक ऊर्जा बाजार—सभी इस संकट को प्रभावित करते हैं। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि युद्ध का खर्च कितना है, बल्कि यह भी है कि क्या सैन्य समाधान की तुलना में कूटनीति और बातचीत पर अधिक संसाधन लगाए जाने चाहिए थे।

सबसे बड़ा खतरा उन विकासशील देशों के लिए है जिनके पास महंगे तेल, खाद्य पदार्थों और बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए सीमित आर्थिक संसाधन हैं। एक तरफ उन्हें विदेशी सहायता में कमी का सामना करना पड़ रहा है और दूसरी तरफ युद्ध के कारण ईंधन तथा परिवहन महंगा हो रहा है। मानवीय संगठनों ने भी चेतावनी दी है कि युद्ध और सहायता में कटौती का दोहरा असर कमजोर आबादी पर पड़ रहा है।

इस पूरी स्थिति ने दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या वैश्विक शक्तियों को अरबों डॉलर युद्ध और हथियारों पर खर्च करने के बजाय शांति, कूटनीति, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास पर अधिक खर्च नहीं करना चाहिए? आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है, खासकर तब जब युद्ध का आर्थिक बोझ केवल लड़ने वाले देशों तक सीमित न रहकर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने लगे।