नेपाल इस समय एक साथ कई बड़े संकटों से जूझ रहा है। 26 अगस्त 2026 को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान के बड़े ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने देश के उत्तरी और मध्य हिस्सों में भारी तबाही मचा दी। 6 सितंबर तक नेपाल में मृतकों की संख्या 1,344 तक पहुंचने और करीब 5,000 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट सामने आई है। हजारों लोगों को बचाया गया है, लेकिन कई इलाकों में राहत और खोज अभियान अभी भी जारी है।
ग्लेशियर टूटने से आई ऐसी तबाही कि गांव और सड़कें तक बह गईं
इस आपदा का केंद्र नेपाल का रसुवा और भोटेकोशी-त्रिशूली नदी क्षेत्र रहा। तेज बहाव अपने साथ पानी के अलावा बर्फ, चट्टान और भारी मात्रा में मलबा लेकर नीचे आया। कई घर, सड़कें, पुल और दूसरी आधारभूत संरचनाएं बह गईं। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने ग्लेशियर के ढहने को इस आपदा का संभावित ट्रिगर बताया है, जबकि इस तरह की घटनाओं को जलवायु परिवर्तन और तेजी से गर्म होते हिमालय से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
तबाही का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहा। नेपाल-चीन सीमा पर स्थित Gyirong सीमा मार्ग भी भारी मलबे में तबाह हो गया। यह रास्ता नेपाल और तिब्बत के बीच व्यापार तथा धार्मिक यात्राओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। Reuters के अनुसार, यह सीमा मार्ग 2015 के भूकंप के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया था, क्योंकि एक अन्य सीमा मार्ग को भारी नुकसान पहुंचा था। अब इस आपदा के बाद वहां दोबारा बुनियादी ढांचा खड़ा करना बड़ी चुनौती बन गया है।
हजारों लोग अभी भी लापता, सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश
नेपाल की सबसे बड़ी चिंता अभी भी लापता लोगों को ढूंढना है। खासकर कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में मजदूरों के फंसे होने की आशंका है। 5 सितंबर को एक चीनी नागरिक को Upper Trishuli-1 Hydropower Project की सुरंग से करीब 225 मीटर अंदर जाकर बचाया गया। इससे पहले दो नेपाली मजदूरों को भी दूसरी सुरंग से जीवित निकाला गया था। इन घटनाओं ने बचाव दलों और परिवारों में उम्मीद पैदा की है कि कुछ अन्य लोग भी जीवित हो सकते हैं।
बचाव अभियान में नेपाली सेना, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के साथ भारत, चीन, दक्षिण कोरिया तथा अन्य देशों की टीमें भी मदद कर रही हैं। भारी मशीनों, हेलीकॉप्टरों, पंपों, रडार उपकरणों और सुरंगों में खुदाई जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत ने राहत सामग्री, डॉक्टरों, पैरामेडिकल कर्मचारियों और खोज-बचाव उपकरणों सहित 68.5 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी है।
सड़कों और पुलों का भारी नुकसान, पुनर्निर्माण सबसे बड़ी चुनौती
बाढ़ ने नेपाल की परिवहन व्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लगभग 82 किलोमीटर लंबे Galchhi-Betrawati-Rasuwagadhi मार्ग के 40 किलोमीटर हिस्से को पूरी तरह नुकसान पहुंचा है और 16 किलोमीटर हिस्सा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है। कई मोटर योग्य पुल और झूला पुल भी बह गए हैं। इससे राहत पहुंचाने के साथ-साथ व्यापार और सामान्य आवाजाही बहाल करना मुश्किल हो गया है।
सरकार अब केवल राहत और बचाव से आगे बढ़कर पुनर्वास की दिशा में जाने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री बालेन शाह सरकार ने प्रभावित स्थानीय निकायों के लिए 1 अरब नेपाली रुपये जारी किए हैं। अस्थायी शिविरों में हजारों लोगों को रखा गया है और स्वास्थ्य विभाग संभावित संक्रामक बीमारियों को रोकने के लिए निगरानी कर रहा है।
नेपाल की हाइड्रोपावर महत्वाकांक्षा पर भी बड़ा सवाल
नेपाल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत यानी Hydropower की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लेकिन इस बाढ़ ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बदलते जलवायु जोखिमों के बीच पहाड़ी नदियों और घाटियों में बड़े बिजली प्रोजेक्ट कितने सुरक्षित हैं। Reuters के अनुसार, बाढ़ से नेपाल की लगभग 431 मेगावाट, यानी करीब 10 प्रतिशत बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई और देश को बिजली निर्यात रोककर भारत से बिजली आयात करनी पड़ी।
यह घटना नेपाल के लिए केवल तत्काल आर्थिक नुकसान नहीं है। देश आने वाले वर्षों में अपनी हाइड्रोपावर क्षमता को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की योजना बना रहा है और भारत को बिजली निर्यात करना उसकी महत्वपूर्ण आर्थिक रणनीति है। लेकिन अगर अत्यधिक बारिश, ग्लेशियर टूटने और अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम बढ़ता है, तो भविष्य की परियोजनाओं की डिजाइन, जगह और सुरक्षा मानकों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
बालेन शाह सरकार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
नेपाल की राजनीति में भी पिछले एक साल में बड़ा बदलाव आया है। 2025 के Gen-Z आंदोलन और राजनीतिक संकट के बाद 2026 में बालेंद्र “बालेन” शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनी। बालेन शाह ने भ्रष्टाचार पर कार्रवाई, सरकारी संस्थाओं में सुधार और तेज प्रशासन का वादा किया था। उनकी सरकार को संसद में मजबूत जनादेश मिला, लेकिन अब इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा ने उनकी सरकार के सामने प्रशासनिक क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा खड़ी कर दी है।
बालेन सरकार के सामने चुनौती केवल लोगों को बचाने की नहीं है। सरकार को हजारों परिवारों का पुनर्वास, सड़कों और पुलों का निर्माण, बिजली व्यवस्था की बहाली, प्रभावित बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को दोबारा गति देने जैसे कई काम एक साथ करने होंगे। यही कारण है कि आने वाले महीनों में इस सरकार का मूल्यांकन केवल राजनीतिक नारों से नहीं बल्कि संकट प्रबंधन और पुनर्निर्माण के परिणामों से होगा।
अर्थव्यवस्था: संकट के बावजूद कुछ सकारात्मक संकेत
आपदा से पहले नेपाल की अर्थव्यवस्था में कुछ महत्वपूर्ण सुधार दिखाई दे रहे थे। IMF के अनुसार, महंगाई में बड़ी गिरावट आई थी, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुआ था और सरकारी वित्तीय स्थिति में भी सुधार हुआ था। IMF के मुताबिक औसत महंगाई वित्त वर्ष 2022-23 के 7.7 प्रतिशत से घटकर 2025-26 की पहली छमाही में 1.7 प्रतिशत हो गई थी और विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 12 महीने से अधिक के आयात को कवर करने की स्थिति में पहुंच गया था।
लेकिन अब प्राकृतिक आपदा ने सरकार के सामने नए आर्थिक दबाव पैदा कर दिए हैं। सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं, घरों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने में भारी खर्च होगा। इसका असर सरकारी बजट, निवेश और रोजगार पर पड़ सकता है। साथ ही पर्यटन और सीमा व्यापार प्रभावित होने से विदेशी मुद्रा कमाने के स्रोतों पर भी दबाव आ सकता है।
भारत और नेपाल के रिश्तों के लिए भी महत्वपूर्ण समय
नेपाल और भारत के बीच लोगों, व्यापार, रोजगार, संस्कृति और धार्मिक यात्राओं के बेहद गहरे संबंध हैं। मौजूदा आपदा में भारत की राहत और बचाव सहायता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के बीच आपदा प्रबंधन सहयोग की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। नेपाल की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र के लिए भारतीय बाजार भी महत्वपूर्ण है, खासकर हाइड्रोपावर के संदर्भ में।
वहीं नेपाल चीन के साथ भी अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है। बालेन शाह सरकार की विदेश नीति में भारत और चीन दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है। ऐसे समय में जब नेपाल को एक तरफ भारत के बाजार और सहयोग की आवश्यकता है और दूसरी तरफ चीन के साथ व्यापार तथा बुनियादी ढांचे के संबंध महत्वपूर्ण हैं, कूटनीतिक संतुलन नई सरकार के लिए अहम रहेगा।
पर्यटन पर कितना असर पड़ेगा?
नेपाल दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पर्वतीय पर्यटन स्थलों में से एक है। एवरेस्ट, अन्नपूर्णा, लांगटांग और कैलाश जाने वाले यात्रियों के लिए नेपाल महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। लेकिन मौजूदा आपदा ने दिखा दिया है कि हिमालयी पर्यटन क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के प्रति कितना संवेदनशील है।
Gyirong सीमा मार्ग का नष्ट होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नेपाल-तिब्बत व्यापार के साथ-साथ कैलाश-मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण रास्ता था। Reuters के अनुसार, इस मार्ग से हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में हिंदू तीर्थयात्री भी गुजरते थे।
क्या यह केवल प्राकृतिक आपदा है या जलवायु परिवर्तन की चेतावनी?
नेपाल की मौजूदा त्रासदी का सबसे बड़ा सवाल यही है। किसी एक घटना को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन वैज्ञानिक शोध यह संकेत देता है कि गर्म होता हिमालय ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ग्लेशियर पिघलने, झीलों के विस्तार, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
नेपाल का योगदान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में बहुत छोटा है, लेकिन हिमालयी देश होने के कारण वह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इसलिए नेपाल के लिए यह सिर्फ राहत का सवाल नहीं है; यह अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त, आपदा-पूर्व चेतावनी प्रणाली और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे का भी सवाल है।
आगे नेपाल के सामने क्या चुनौतियां हैं?
आने वाले दिनों में नेपाल को तीन स्तरों पर काम करना होगा—पहला, अभी भी लापता लोगों की खोज और प्रभावित परिवारों को राहत; दूसरा, बिजली, सड़क, पुल और घरों का पुनर्निर्माण; और तीसरा, भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचने के लिए मजबूत चेतावनी और सुरक्षा व्यवस्था बनाना।
विशेषज्ञों के लिए भी यह घटना एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि पुराने मौसम और बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर बनाए गए जोखिम मॉडल अब पर्याप्त नहीं हो सकते। हिमालय में बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाइड्रोपावर, सड़क, पुल और बस्तियों की योजना बनानी होगी।
निष्कर्ष: नेपाल एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहा है
नेपाल इस समय केवल एक प्राकृतिक आपदा से नहीं लड़ रहा। देश को बाढ़ और ग्लेशियर संकट, लापता लोगों की खोज, बुनियादी ढांचे की तबाही, हाइड्रोपावर को हुए नुकसान, आर्थिक पुनर्निर्माण, पर्यटन पर असर और राजनीतिक अपेक्षाओं—इन सभी चुनौतियों का सामना एक साथ करना पड़ रहा है।
प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार के लिए यह सबसे कठिन परीक्षा हो सकती है। यदि सरकार राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण को तेजी से और पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ाती है, तो यह संकट नेपाल में नए प्रशासनिक मॉडल की नींव बन सकता है। लेकिन यदि पुनर्निर्माण धीमा हुआ या संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर विवाद बढ़े, तो जनता का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।
नेपाल की मौजूदा त्रासदी पूरी दुनिया के लिए भी एक संदेश है—हिमालय केवल बर्फ और पहाड़ों का क्षेत्र नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की जल, ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। वहां होने वाला बदलाव आने वाले वर्षों में पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित कर सकता है।


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