नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026
भारत की जनगणना (Census) का मुख्य उद्देश्य हर व्यक्ति और घर की गिनती करना है, लेकिन कुछ समुदाय और लोग हमेशा पूरी तरह शामिल नहीं हो पाते या उनकी गिनती मुश्किल होती है। ये मुख्य रूप से उनकी जीवनशैली, पहुंच की समस्या, सामाजिक स्थिति या ऐतिहासिक कारणों से होता है। आगामी जनगणना 2026-27 में भी ये चुनौतियां बनी रह सकती हैं, हालांकि सरकार डिजिटल तरीके से इसे बेहतर बनाने की कोशिश कर रही है।
मुख्य समुदाय और लोग जिनकी गिनती पूरी नहीं हो पाती
- खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश समुदाय (Nomadic and Semi-Nomadic Tribes – NT/ Semi-NT)
- ये लोग एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं, जैसे बाजार, मेलों, निर्माण साइट्स पर काम करने वाले।
- 1931 के बाद से इनकी अलग से सटीक जनगणना नहीं हुई है।
- Denotified Tribes (DNT) या Vimukta Jati और Ghumantu Tribes की संख्या करोड़ों में बताई जाती है, लेकिन आंकड़े पुराने और अधूरे हैं।
- कारण: स्थायी पता न होना, दस्तावेजों की कमी, गणनाकर्ताओं की पहुंच न पहुंचना।
- बेघर और सड़क पर रहने वाले लोग (Homeless Population)
- सड़कों, फुटपाथों, पुलों के नीचे, रेलवे स्टेशनों पर रहने वाले।
- इनकी गिनती रात के समय विशेष सर्वे से की जाती है, लेकिन कई छूट जाते हैं।
- अनुमान: लाखों में, लेकिन सटीक संख्या नहीं पता।
- प्रवासी मजदूर और अस्थायी निवासी (Migrants and Temporary Residents)
- काम की तलाश में दूसरे राज्यों में रहने वाले, जैसे निर्माण मजदूर, फैक्टरी वर्कर।
- ये अपने मूल घर पर गिने जाते हैं, लेकिन जहां रहते हैं वहां नहीं।
- कारण: डेटा ओवरलैप या मिसिंग, खासकर सीजनल माइग्रेंट्स।
- ट्रांसजेंडर और अन्य लिंग समुदाय (Transgender and Gender Minorities)
- 2011 में पहली बार ‘अन्य’ कैटेगरी आई, लेकिन कई ट्रांस लोग परिवार से बाहर रहते हैं या पहचान छिपाते हैं।
- 2021/2027 में ‘ट्रांसजेंडर’ विकल्प है, लेकिन अभी भी अंडर-काउंटिंग होती है।
- कारण: सामाजिक कलंक, परिवार से बहिष्कार, दस्तावेजों की कमी।
- अन्य पिछड़े या वंचित समूह (जैसे कुछ DNT, Dalit सब-कास्ट्स)
- Denotified Tribes (DNT) को अलग से नहीं गिना जाता, SC/ST/OBC में मिक्स हो जाते हैं।
- कुछ मुस्लिम/ईसाई दलित जातियां SC/ST में नहीं आतीं, इसलिए अलग गिनती नहीं।
- OBC की सटीक जाति-आधारित गिनती 1931 के बाद नहीं हुई (केवल SC/ST की होती है)।
क्यों होती है ये समस्या?
- जीवनशैली: घूमंतू होने से स्थायी पता नहीं।
- सामाजिक कलंक: ट्रांस या बेघर लोग खुद को रिपोर्ट नहीं करते।
- तकनीकी चुनौतियां: डिजिटल जनगणना में ग्रामीण/बिना स्मार्टफोन वाले छूट सकते हैं।
- ऐतिहासिक: 1931 के बाद जाति गिनती सीमित, DNT को ब्रिटिश काल में क्रिमिनल ट्राइब्स कहा गया था।
क्या बदलाव आ रहे हैं?
- 2026-27 जनगणना डिजिटल होगी, जाति गिनती भी शामिल।
- DNT और ट्रांसजेंडर के लिए विशेष प्रावधान की मांग बढ़ रही है।
- लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना अतिरिक्त प्रयास के करोड़ों लोग फिर छूट सकते हैं।
ये समुदाय नीतियां, आरक्षण, कल्याण योजनाओं से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उनकी सही संख्या नहीं पता।


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