नई दिल्ली, 10 फरवरी 2026: भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद पर पूरी तरह रोक लगाने की कोई आधिकारिक घोषणा अब तक नहीं की है, भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील के बाद दावा किया हो कि भारत ने रूसी तेल आयात (सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से) बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है। विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सर्वोच्च हैं, और कोई भी फैसला बाजार की स्थितियों, कीमतों तथा विविधीकरण पर आधारित होगा—न कि किसी बाहरी दबाव पर।
ट्रेड डील और ट्रंप का दावा
2 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुए अंतरिम ट्रेड फ्रेमवर्क के तहत अमेरिका ने भारत पर लगाया गया 25% पेनल्टी टैरिफ (रूसी तेल खरीद के कारण) हटा दिया, जिससे कुल टैरिफ 50% से घटकर 18% रह गया। ट्रंप ने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में कहा कि भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने, अमेरिका से ज्यादा ऊर्जा खरीदने और रक्षा सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। व्हाइट हाउस ने 9 फरवरी को दोहराया कि अमेरिका अब भारत के रूसी तेल आयात की निगरानी करेगा—यदि भारत फिर से खरीद शुरू करता है, तो 25% टैरिफ दोबारा लग सकता है।
ट्रंप ने दावा किया कि यह कदम यूक्रेन युद्ध में रूस की फंडिंग रोकने में मदद करेगा और भारत वेनेजुएला तथा अमेरिका से तेल खरीद बढ़ाएगा। लेकिन भारत की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने 9 फरवरी को कहा, “राष्ट्रीय हित हमारा मार्गदर्शक होगा। ऊर्जा फैसले सस्ते दाम, भरोसेमंद सप्लाई और स्रोतों में विविधता पर आधारित होंगे।” वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “इस सवाल का जवाब विदेश मंत्रालय देगा,” और उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा को 1.4 अरब भारतीयों की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।
रूसी तेल आयात की वर्तमान स्थिति
- 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया था (पीक पर 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से ज्यादा)।
- अब आयात में गिरावट आई है: जनवरी 2026 में औसतन 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन (Kpler डेटा), दिसंबर 2025 में दो साल का न्यूनतम स्तर।
- प्रमुख रिफाइनर (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, रिलायंस) ने अप्रैल 2026 के लिए रूसी तेल खरीद से परहेज किया है। मार्च तक आयात 1 मिलियन बैरल से नीचे जा सकता है, और लंबे समय में 5-6 लाख बैरल प्रतिदिन तक सिमट सकता है।
- कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी अब 22-25% के आसपास है (पहले 35-40%)।
क्यों नहीं लगाई पूरी रोक? मुख्य कारण
- ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक प्रभाव: भारत अपनी 85-88% तेल जरूरत आयात करता है। रूसी तेल सस्ता (छूट पर) और भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त (हैवी/सौर ग्रेड) है। पूरी रोक से कीमतें बढ़ सकती हैं, मुद्रास्फीति बढ़ेगी, विनिर्माण लागत प्रभावित होगी और उपभोक्ता पर बोझ पड़ेगा। विशेषज्ञों (मूडीज, क्लपर) का कहना है कि अचानक बंद करना व्यावहारिक नहीं।
- बाजार-आधारित निर्णय: सरकार कहती है कि खरीद कंपनियां (IOC, BPCL, रिलायंस) बाजार कीमत, उपलब्धता और अनुबंधों के आधार पर करती हैं। कोई सरकारी निर्देश नहीं कि रूस से पूरी तरह बंद करो।
- रणनीतिक स्वायत्तता और रूस के साथ संबंध: भारत की विदेश नीति बहुपक्षीय है। रूस से रक्षा सौदे, तकनीक और ऐतिहासिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। पूरी रोक से ये प्रभावित हो सकते हैं। रूस ने कहा है कि भारत से कोई रोक लगाने की बात नहीं आई।
- विविधीकरण की रणनीति: भारत पहले से ही इराक, सऊदी अरब, UAE, अमेरिका और वेनेजुएला से आयात बढ़ा रहा है। अमेरिका से आयात बढ़ा है, लेकिन रूस से पूरी तरह अलग होना धीरे-धीरे होगा—अचानक नहीं।
- ट्रंप के दबाव के बावजूद संतुलन: ट्रेड डील से फायदा मिला (टैरिफ हटाया), लेकिन भारत ने स्पष्ट कहा कि फैसले दबाव में नहीं होंगे। रूस ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह भारत को सस्ता तेल खरीदने से रोक रहा है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि रूसी तेल आयात और कम होगा (मार्च 2026 तक आधा तक), लेकिन पूरी तरह शून्य होने की संभावना कम है। यदि वैश्विक कीमतें या यूक्रेन स्थिति बदलती है, तो नीति में बदलाव संभव है। अभी भारत संतुलन बनाए रख रहा है—अमेरिका के साथ व्यापार मजबूत कर रहा है, लेकिन राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं कर रहा। यह मामला भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और ऊर्जा कूटनीति का एक और उदाहरण है।


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