नई दिल्ली, 6 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। वे 2014 में आबकारी अधिनियम के मामलों में जमानत देने के लिए कथित रूप से अलग-अलग मापदंड अपनाने और भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर सेवा से हटाए गए थे। शीर्ष अदालत ने इस कार्रवाई को अनुचित ठहराते हुए उन्हें सेवानिवृत्ति तक पूर्ण मौद्रिक लाभ देने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
- निर्भय सिंह सुलिया अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर थे।
- उन पर आरोप लगा कि उन्होंने कुछ जमानत याचिकाओं में दोहरा मापदंड अपनाया।
- जांच में मुख्य रूप से कोर्ट स्टेनोग्राफर के आचरण पर फोकस था, जबकि जज के विशिष्ट आदेशों पर कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की सिफारिश पर राज्य सरकार ने सितंबर 2015 में उन्हें बर्खास्त कर दिया।
- हाईकोर्ट ने भी बर्खास्तगी को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ सुलिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने सोमवार (5 जनवरी 2026) को फैसला सुनाया:
- बर्खास्तगी के आदेश और हाईकोर्ट के निर्णय को रद्द किया।
- कहा कि मात्र जमानत आदेशों में कानूनी प्रावधान उद्धृत न करने या गलत निर्णय देने पर न्यायाधीश को अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
- भ्रष्टाचार, पक्षपात या दुर्भावना के स्पष्ट सबूत के बिना ऐसी कठोर सजा अनुचित है।
- निर्भय सिंह सुलिया को 27 वर्ष की बेदाग सेवा का हवाला देते हुए राहत दी।
हाईकोर्ट और अधीनस्थ न्यायपालिका को महत्वपूर्ण सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा:
- न्यायिक अधिकारियों पर तुच्छ या बेबुनियाद आरोप लगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, खासकर पीड़ित पक्षों के कहने पर।
- इससे निचली अदालतों के जज जमानत देने में डरते हैं, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता कमजोर हो रही है।
- परिणामस्वरूप हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर जमानत याचिकाओं का बोझ बढ़ जाता है।
- हाईकोर्ट्स को अनुशासनात्मक कार्रवाई में अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए। केवल निर्णय की त्रुटि पर यांत्रिक कार्रवाई से बचें।
- निडर न्यायाधीश ही स्वतंत्र न्यायपालिका की असली नींव हैं। ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा जरूरी है।
फैसले का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जजों को अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने में अधिक आत्मविश्वास मिलेगा, खासकर जमानत जैसे संवेदनशील मामलों में। साथ ही, यह हाईकोर्ट्स के लिए एक दिशानिर्देश है कि अनुशासनात्मक प्रक्रिया में उचित प्रक्रिया (due process) का पालन अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गलत आदेश और भ्रष्टाचार को एक समान नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में सबूतों की गहन जांच जरूरी है।


More Stories
बाल राम बाहुबली महाराज का खौफनाक ऐलान: 2031 में उत्तर प्रदेश से आएगा देश का नया PM – कौन होगा वो?
अंबरनाथ में बड़ा धोखा: सबसे बड़ी पार्टी शिंदे सेना बाहर, BJP-कांग्रेस की गुप्त डील ने सबको चौंकाया!
वैष्णो देवी कॉलेज की मान्यता रातोंरात रद्द… 42 मुस्लिम छात्रों का एडमिशन बना वजह? पूरी सच्चाई उजागर!