नई दिल्ली, 2 दिसंबर 2025: देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु प्रदूषण अब एक चुपके से हमला करने वाला ‘साइलेंट किलर’ बन चुका है। हर सर्दी में घुटती सांसों की यह समस्या इस बार भी लौट आई है, लेकिन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की ताजा रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की जहरीली हवा का मुख्य दोषी पराली जलाना नहीं, बल्कि शहर के अंदर के स्थानीय स्रोत जैसे वाहनों का धुआं, फैक्टरियां, कचरा जलाना और धूल हैं। पराली का योगदान इस बार महज 5-22% तक सीमित रहा, फिर भी अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली-NCR का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) लगातार ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ के बीच घूमता रहा। यह रिपोर्ट न सिर्फ प्रदूषण की जड़ों को उजागर करती है, बल्कि चेतावनी भी देती है कि अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो स्वास्थ्य संकट और गहरा जाएगा।
प्रदूषण का ‘टॉक्सिक कॉकटेल’: स्थानीय स्रोतों का जहर
CSE की रिपोर्ट ‘टॉक्सिक कॉकटेल ऑफ पॉल्यूशन ड्यूरिंग अर्ली विंटर इन दिल्ली-NCR’ 1 दिसंबर को जारी की गई। इसमें अक्टूबर से 15 नवंबर तक के डेटा का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली-NCR में PM2.5 (बारीक कण), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का स्तर दिन-प्रतिदिन एक साथ बढ़ रहा है, जो मुख्य रूप से वाहनों के उत्सर्जन और दहन स्रोतों से आ रहा है। सुबह 7-10 बजे और शाम 6-9 बजे ट्रैफिक के पीक आवर्स में ये प्रदूषक तेजी से उछाल मारते हैं।
- पराली का कमजोर रोल: पंजाब-हरियाणा में इस साल पराली जलाने की घटनाएं 71% कम रहीं, जो कई सालों का न्यूनतम स्तर है। रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर दिनों में पराली का योगदान 5% से भी नीचे रहा। केवल 12-13 नवंबर को यह 22% तक पहुंचा, लेकिन बाकी समय स्थानीय स्रोतों ने ही हवा को जहर बना दिया।
- स्थानीय स्रोतों की मार: वाहन (ट्रैफिक) सबसे बड़ा अपराधी हैं, जो PM2.5, NO2 और CO का ‘टॉक्सिक मिश्रण’ पैदा करते हैं। इसके अलावा, फैक्टरियों से निकलने वाली धूल, खुले में कचरा जलाना, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल और घरेलू ईंधन जलाना भी बड़ा योगदान दे रहे हैं। NCR के छोटे शहर जैसे बहादुरगढ़, गाजियाबाद और हापुड़ में दिल्ली से भी ज्यादा तीव्र स्मॉग देखा गया।
रिपोर्ट में CSE की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता रॉयचौधरी ने कहा, “पराली के बिना भी हवा खराब है। अब फोकस स्थानीय स्रोतों पर होना चाहिए। NCR अब एक ही प्रदूषित एयरशेड की तरह व्यवहार कर रहा है, जहां प्राकृतिक फैलाव की कोई गुंजाइश नहीं बची।”
सात सालों का काला अध्याय: खतरे के स्तर पर PM2.5
रिपोर्ट 2019 से 2025 तक के सात सालों के ट्रेंड्स को भी रिव्यू करती है। इसमें पाया गया कि सर्दियों में PM2.5 का स्तर लगातार ‘खतरनाक’ ऊंचाई पर बना हुआ है। इस साल शुरुआती सर्दी में औसत PM2.5 पिछले साल से 9% कम है, लेकिन तीन साल पुराने बेसलाइन से कोई सुधार नहीं।
दिल्ली में प्रदूषण हॉटस्पॉट्स बढ़ रहे हैं। 2018 में 13 हॉटस्पॉट्स थे, अब नई जगहें जैसे विवेक विहार, अलीपुर, नेहरू नगर, सिरि फोर्ट, द्वारका सेक्टर-8 और पटपड़गंज भी शामिल हो गई हैं। जहांगीरपुरी सबसे प्रदूषित इलाका रहा, जहां वार्षिक PM2.5 औसत 119 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (µg/m³) दर्ज किया गया। इसके बाद बवाना-वजीरपुर (113 µg/m³), आनंद विहार (111 µg/m³) और मुंडका-रोहिणी-अशोक विहार (101-103 µg/m³)।
2 दिसंबर को दोपहर 4 बजे का अपडेटेड AQI डेटा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार 300 के ऊपर रहा, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है। दिल्ली के 22 मॉनिटरिंग स्टेशनों पर से 59 दिनों में 30 से ज्यादा दिनों तक CO का स्तर तय सीमा से ऊपर रहा, खासकर द्वारका सेक्टर-8 (55 दिन), जहांगीरपुरी और दिल्ली यूनिवर्सिटी नॉर्थ कैंपस (50-50 दिन) में।
स्वास्थ्य पर कहर: कैंसर से हार्ट अटैक तक का खतरा
यह प्रदूषण सिर्फ सांसों को नहीं, बल्कि पूरे शरीर को नुकसान पहुंचा रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, PM2.5, NO2 और CO का यह कॉकटेल कैंसर और हार्ट अटैक का खतरा 20-30% बढ़ा देता है। दिल्ली में सांस संबंधी बीमारियां, हृदय रोग, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के केसों में तेजी आई है। बच्चे, बुजुर्ग और अस्थमा रोगी सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि छोटे-मोटे सुधार अब काफी नहीं। CSE के शरणजीत कौर ने कहा, “दिल्ली ने एक इन्फ्लेक्शन पॉइंट पहुंचा लिया है। अगर स्थानीय स्रोतों पर कंट्रोल नहीं किया गया, तो सर्दी का ‘कोल्ड काल’ जानलेवा साबित होगा।” सुप्रीम कोर्ट ने भी 1 दिसंबर को इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई, कहा कि प्रदूषण के लिए सिर्फ पराली को जिम्मेदार ठहराना गलत है। कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा, CPCB और CAQM से रिपोर्ट मांगी है।
समाधान के रास्ते: CSE के सुझाव और सरकारी कदम
CSE ने प्रदूषण कम करने के लिए ठोस सिफारिशें की हैं:
- वाहनों पर कंट्रोल: ईंधन की गुणवत्ता सुधारें, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दें, ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम मजबूत करें।
- उद्योग और कचरा: फैक्टरियों में क्लीन फ्यूल अनिवार्य करें, कचरा अलग-अलग करें, रिसाइकलिंग बढ़ाएं और खुले में जलाना पूरी तरह बंद।
- धूल नियंत्रण: निर्माण साइट्स पर वाटर स्प्रिंकलिंग, कंस्ट्रक्शन वेस्ट रिसाइकलिंग और रोड डस्ट मॉनिटरिंग।
- घरेलू स्तर: क्लीन कुकिंग गैस को प्रोत्साहन, पराली को बायो-मेथेनेशन या एथनॉल उत्पादन में बदलें।
सरकार की ओर से ‘ऑपरेशन क्लीन एयर’ के तहत 321 सड़कों का निरीक्षण किया गया, जहां धूल को मुख्य कारण बताया गया। दिल्ली सरकार ने 15 साल से पुराने वाहनों को ईंधन देने पर रोक लगाई है, जबकि CAQM ने BS-VI/CNG/EV वाहनों को प्राथमिकता दी। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इन कदमों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है।
निष्कर्ष: जहर की चादर से बाहर निकलने का समय
दिल्ली-NCR अब पराली के बहाने से बच नहीं सकता। CSE की यह रिपोर्ट एक वेक-अप कॉल है कि प्रदूषण शहर का अपना बनाया हुआ है। लाखों लोग रोज सांस लेते हुए जहर पी रहे हैं, लेकिन समाधान भी हमारे हाथ में है। अगर केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय मिलकर स्थानीय स्रोतों पर हमला करें, तो साफ हवा की सांस फिर लौट सकती है। फिलहाल, मास्क पहनें, बाहर कम निकलें और AQI चेक करते रहें—क्योंकि यह साइलेंट किलर चुपके से घातक साबित हो रहा है।
(यह स्टोरी CSE रिपोर्ट, CPCB डेटा और विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। अपडेटेड AQI के लिए CPCB वेबसाइट चेक करें।)


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