दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश पर अब विवाद गहरा गया है! भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ की जगह कार्यभार संभालने वाले मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने इस आदेश की समीक्षा करने का संकेत दिया है। यह कदम पिछले कोर्ट के फैसलों से टकराव और जानवरों के हक में उठ रही आवाजों के बीच आया है।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश? (11 अगस्त, 2025)
11 अगस्त को जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने एक अहम आदेश जारी किया था। इसमें दिल्ली-एनसीआर की नगर निकायों को 6 से 8 हफ्तों के भीतर सभी आवारा कुत्तों को निर्धारित शेल्टर होम में पहुंचाने का निर्देश दिया गया। मकसद था आवासीय इलाकों, सार्वजनिक स्थलों और संवेदनशील जगहों को आवारा कुत्तों से मुक्त करना। आदेश की मुख्य बातें थीं:
- शेल्टर बनाना: नसबंदी, टीकाकरण और चिकित्सा सुविधा वाले शेल्टर स्थापित करना।
- सड़कों पर वापसी पर रोक: पकड़े गए कुत्तों को सड़कों पर छोड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध।
- तुरंत कार्रवाई: कुत्ते के काटने की शिकायत पर 4 घंटे के भीतर कार्रवाई के लिए हेल्पलाइन बनाना।
- निगरानी: कैप्चर ड्राइव में बाधा डालने वालों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की चेतावनी के साथ सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था।
- रिकॉर्ड रखना: पकड़े गए जानवरों का विस्तृत ब्यौरा रखना।
इस आदेश का उद्देश्य “आवारा कुत्तों की समस्या” का व्यवस्थित समाधान करना और मानव सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए शेल्टरों में मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करना था।
पुराने फैसले से टकराव!
यहां मुश्किल खड़ी हो गई। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की ही एक पुरानी पीठ (जस्टिस जे के माहेश्वरी और संजय करोल) के फैसले से सीधे टकराता दिख रहा है। उस पुराने फैसले में:
- आवारा कुत्तों को बिना सोचे-समझे हटाने या मारने पर रोक लगाई गई थी।
- सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखने पर जोर दिया गया था।
- हटाने के बजाय नियमित टीकाकरण और नसबंदी (ABC कार्यक्रम) जैसे विकल्प अपनाने को कहा गया था।
याचिका और CJI गवई की प्रतिक्रिया
13 अगस्त को एक वकील ने CJI गवई की पीठ के सामने एक याचिका रखी। इसमें:
- ताजा आदेश को पुराने फैसले के विरुद्ध बताया गया।
- जोर देकर कहा गया कि जनवरों को हटाने के बजाय नसबंदी और टीकाकरण पर ध्यान देना चाहिए।
CJI गवई ने स्पष्ट कहा: “मैं इस पर विचार करूंगा।” यह बयान संकेत देता है कि वे इस मामले की जांच कर सकते हैं और ताजा आदेश में बदलाव या समीक्षा की संभावना है।
जोरदार विरोध और जानवरों के हक की चिंता
11 अगस्त के आदेश के खिलाफ जानवरों के हक के लिए काम करने वालों, संगठनों और राजनीतिक नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है:
- दिल्ली में प्रदर्शन: इंडिया गेट सहित कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। जानवरों को खाना खिलाने वाले कई लोगों को भी हिरासत में लिया गया।
- आलोचनाएं:
- अव्यावहारिक और क्रूर: कार्यकर्ता मानते हैं कि आदेश लागू करना मुश्किल है। राज्य द्वारा चलाए जा रहे शेल्टरों की भारी कमी है। शेल्टरों में जानवरों की संख्या बढ़ने से भीषण भीड़भाड़ और खराब हालात होंगे।
- सफल कार्यक्रम बाधित: स्थानीय स्तर पर चल रहे टीकाकरण/नसबंदी कार्यक्रम बुरी तरह प्रभावित होंगे। ये कार्यक्रम बिना जानवरों को हटाए उनकी आबादी नियंत्रित करने में कारगर साबित हुए हैं।
- प्रमुख आलोचक:
- मेनका गांधी: उन्होंने फैसले को “लागू करने योग्य नहीं” बताया और कहा कि यह “गुस्से में दिया गया” फैसला लगता है।
- राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा: उन्होंने भी विरोध जताया और जानवरों के साथ नैतिक व्यवहार की बात कही।
हालांकि, कुत्तों के काटने की घटनाओं से परेशान कई निवासियों ने इस आदेश का स्वागत किया है और इसे सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बताया है।
अब क्या? भविष्य की राह
फिलहाल, CJI गवई द्वारा समीक्षा को लेकर कोई नई जानकारी नहीं है। लेकिन उनके “देखूंगा” कहने से यही संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस मुद्दे पर फिर से विचार कर सकता है।
बड़ा सवाल यह है कि कैसे तय होगा संतुलन? एक तरफ आम लोगों की सुरक्षा की चिंता है, तो दूसरी तरफ आवारा जानवरों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण और उनके कल्याण की जिम्मेदारी। CJI गवई की संभावित समीक्षा से इस जटिल और भावुक मुद्दे पर नया मोड़ आने की उम्मीद है।
क्या आपको लगता है कुत्तों को सड़कों से हटाना सही समाधान है, या फिर टीकाकरण और नसबंदी पर जोर देना चाहिए?


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