वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 7 जनवरी 2026 को एक राष्ट्रपति ज्ञापन (Presidential Memorandum) पर हस्ताक्षर कर अमेरिका को कुल 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और समझौतों से अलग करने का आदेश दिया। इनमें भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है, जो सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने वाला प्रमुख वैश्विक मंच है। व्हाइट हाउस ने इसे “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा बताया, जबकि वैश्विक स्तर पर इसे जलवायु परिवर्तन और बहुपक्षीय सहयोग के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
फैसले का विवरण
- कब और कैसे हुआ? 7 जनवरी 2026 को ट्रंप ने ज्ञापन जारी किया, जिसमें सभी संबंधित विभागों को इन संगठनों से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया।
- कुल संख्या: 66 संगठन (कुछ रिपोर्ट्स में 65-66 का उल्लेख, लेकिन आधिकारिक तौर पर 66)।
- 31 संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़े संगठन।
- 35 गैर-UN संगठन।
- प्रमुख संगठनों में शामिल:
- इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) – भारत और फ्रांस द्वारा 2015 में शुरू, मुख्यालय गुरुग्राम (भारत) में।
- UNFCCC (यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज)।
- IPCC (इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज)।
- इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (IRENA)।
- अन्य: इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर, 24/7 कार्बन-फ्री एनर्जी कॉम्पैक्ट आदि।
- कारण: व्हाइट हाउस के अनुसार, ये संगठन “अमेरिकी हितों के विपरीत”, “फिजूलखर्ची करने वाले”, “अमेरिका-विरोधी” या “अनावश्यक” हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इनमें अमेरिका का पैसा बर्बाद होता है और वे राष्ट्रीय सुरक्षा व हितों को नुकसान पहुंचाते हैं।
इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) पर खास असर
- ISA की स्थापना 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद की पहल पर हुई थी। इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा वाले देशों में सोलर एनर्जी को सस्ता और पहुंचयोग्य बनाना है।
- वर्तमान में 120+ देश सदस्य या साइनेटरी।
- अमेरिका 2021 में बाइडेन प्रशासन के दौरान ISA में शामिल हुआ था।
- अब अलग होने से भारत के लिए यह राजनयिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि ISA भारत की वैश्विक जलवायु नेतृत्व की प्रमुख मिसाल था।
- विशेषज्ञों का कहना: यह फैसला ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति और जलवायु परिवर्तन को कम प्राथमिकता देने की रणनीति का हिस्सा है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
- भारत: अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन पूर्व राजदूत कंवल सिबाल ने इसे “wrecking ball diplomacy” (विनाशकारी कूटनीति) करार दिया।
- यूरोप और पर्यावरण समूह: गार्जियन और अन्य ने इसे “शर्मनाक” और जलवायु प्रयासों के लिए “विनाशकारी” बताया। IPCC और UNFCCC से अलग होना पेरिस समझौते से बाहर निकलने की दिशा में कदम माना जा रहा।
- व्हाइट हाउस: “ये संगठन अमेरिकी हितों की सेवा नहीं करते। हम अपना पैसा और ऊर्जा अमेरिकी नागरिकों पर खर्च करेंगे।”
- विशेषज्ञ: यह ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) की नीति की याद दिलाता है, जब अमेरिका पेरिस समझौते और WHO से अलग हुआ था।
वर्तमान स्थिति
- अलग होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, लेकिन कुछ संगठनों में यह 1 साल तक लग सकता है (जैसे संधियों में नोटिस पीरियड)।
- यह फैसला ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही आया है, जो वैश्विक संस्थाओं से अमेरिका की दूरी बढ़ाने का संकेत देता है।
- जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि इससे वैश्विक सौर ऊर्जा और क्लाइमेट एक्शन को नुकसान पहुंचेगा, खासकर विकासशील देशों को।
यह घटना वैश्विक कूटनीति में बड़े बदलाव का प्रतीक है, जहां अमेरिका बहुपक्षीय मंचों से दूर हो रहा है।


More Stories
तेहरान जल रहा है: रियाल की गिरावट से शुरू हुआ प्रदर्शन अब इस्लामी गणराज्य के खिलाफ खुली जंग में बदला
ताइवान तनाव की आग में घी: चीन ने जापान को दिया घातक झटका… अब युद्ध की उल्टी गिनती शुरू?
ट्रंप का हाउसिंग बम: बड़े निवेशकों पर घर खरीदने की रोक, लेकिन ओपनडोर CEO क्यों कर रहे समर्थन… छिपा है कौन सा खेल?