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Alliance to remove the dictator... then lifelong enmity! The hidden drama in Bangladesh election series Part-2

तानाशाह हटाने का गठबंधन… फिर जीवनभर की दुश्मनी! बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट-2 में छिपा ड्रामा

ढाका, 10 फरवरी 2026: बांग्लादेश की राजनीति में तीन दशकों तक ‘बेगमों की जंग’ (Battle of the Begums) के नाम से मशहूर शेख हसीना और खालिदा जिया की दुश्मनी आज इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। लेकिन इन दोनों ने कभी एक साथ मिलकर काम किया था—1990 में तत्कालीन सैन्य तानाशाह राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद इरशाद को सत्ता से बेदखल करने के लिए। यह संक्षिप्त गठबंधन लोकतंत्र की बहाली का कारण बना, लेकिन उसके बाद दोनों महिलाओं ने जीवनभर एक-दूसरे को सत्ता से बाहर रखने की जंग लड़ी। खालिदा जिया के 30 दिसंबर 2025 को निधन के बाद यह कहानी अब पूरी हो चुकी है, लेकिन इसका असर बांग्लादेश की आगामी राजनीति पर अभी भी दिख रहा है।

पृष्ठभूमि: सैन्य शासन और दो बेगमों का उदय

1975 में बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। 1981 में राष्ट्रपति जियाउर रहमान (खालिदा जिया के पति) की हत्या के बाद हुसैन मुहम्मद इरशाद ने 1982 में तख्तापलट कर सत्ता हथिया ली। इरशाद ने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया और 1986-88 में विवादास्पद चुनाव करवाए, जिन्हें अधिकांश विपक्ष ने धांधली बताया और बहिष्कार किया।

इसी दौरान दो प्रमुख विपक्षी नेता उभरीं:

  • शेख हसीना — अवामी लीग की प्रमुख, शेख मुजीब की बेटी, जो 1981 से राजनीति में सक्रिय थीं।
  • खालिदा जिया — बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख, जियाउर रहमान की विधवा, जो 1982 से राजनीति में आईं।

दोनों ने अलग-अलग गठबंधनों के जरिए इरशाद के खिलाफ आंदोलन चलाया। 1987 में दोनों ने पहली बार मिलकर इरशाद के इस्तीफे की मांग की, लेकिन सरकार की दमनकारी कार्रवाई (जैसे घर में नजरबंदी) से आंदोलन कमजोर पड़ गया।

1990 का संयुक्त आंदोलन: इरशाद का पतन

1980 के अंत तक इरशाद का शासन कमजोर हो चुका था। छात्रों, मजदूरों और विपक्षी दलों में असंतोष चरम पर था। अक्टूबर 1987 में महाखाली (ढाका) में शेख हसीना और खालिदा जिया की मुलाकात हुई, जहां उन्होंने संयुक्त रणनीति पर सहमति जताई।

नवंबर 1990 तक तीन प्रमुख गठबंधन (BNP-नीत 7-पार्टी गठबंधन, अवामी लीग-नीत 8-पार्टी गठबंधन और वामपंथी 5-पार्टी गठबंधन) ने संयुक्त घोषणा जारी की:

  • इरशाद का तत्काल इस्तीफा।
  • तटस्थ अंतरिम सरकार का गठन।
  • 90 दिनों के भीतर स्वतंत्र चुनाव।

सड़कों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। पुलिस फायरिंग में दर्जनों मौतें हुईं। 4 दिसंबर 1990 को इरशाद ने इस्तीफा दे दिया और मुख्य न्यायाधीश शाहाबुद्दीन अहमद को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया गया। यह बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली का ऐतिहासिक क्षण था। 1991 में हुए चुनाव में खालिदा जिया की BNP ने जीत हासिल की और वे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

फिर शुरू हुई जीवनभर की दुश्मनी: ‘बेगमों की जंग’

इरशाद के पतन के बाद दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यह दुश्मनी इतनी गहरी थी कि बांग्लादेश की राजनीति को ‘बेगमों की जंग’ कहा जाने लगा। मुख्य बिंदु:

  • 1991-1996: खालिदा जिया की सरकार, हसीना विपक्ष में।
  • 1996-2001: हसीना की सरकार, खालिदा विपक्ष में।
  • 2001-2006: खालिदा फिर सत्ता में।
  • 2006-2008: राजनीतिक संकट, सेना समर्थित अंतरिम सरकार ने दोनों को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया।
  • 2009-2024: हसीना की लगातार सत्ता, खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के कई केस, 2018 में जेल, स्वास्थ्य बिगड़ने पर घर में नजरबंदी।
  • हसीना पर आरोप लगे कि उन्होंने खालिदा को राजनीतिक रूप से खत्म करने की कोशिश की।

यह जंग हिंसा, बम विस्फोट, गायब होने और राजनीतिक बदले की घटनाओं से भरी रही। दोनों पार्टियों के समर्थक भी विभाजित रहे।

2024 का उलटफेर और अंतिम अध्याय

2024 में छात्र-नेतृत्व वाले कोटा विरोधी आंदोलन ने हसीना सरकार को उखाड़ फेंका। हसीना भारत भाग गईं। खालिदा जिया को रिहा किया गया। अस्पताल से अपनी आखिरी सार्वजनिक टिप्पणी में खालिदा ने हसीना के पतन को ‘तानाशाही का अंत’ बताया, लेकिन बदले की राजनीति के खिलाफ चेतावनी दी।

30 दिसंबर 2025 को खालिदा जिया का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। हसीना ने भी शोक संदेश में खालिदा को लोकतंत्र की लड़ाई में योगदान के लिए याद किया।

आज का संदर्भ: 12 फरवरी 2026 के चुनाव

अब बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को संसदीय चुनाव हो रहे हैं—1991 के बाद पहली बार बिना हसीना या खालिदा के। अवामी लीग पर प्रतिबंध है। BNP (तारिक रहमान के नेतृत्व में) मजबूत स्थिति में है। यह चुनाव तय करेगा कि ‘बेगमों की जंग’ के बाद बांग्लादेश नई राजनीतिक संस्कृति अपना पाएगा या पुरानी दुश्मनी का साया रहेगा।

यह कहानी बांग्लादेश की राजनीति की विडंबना है—एक बार साथ लड़कर लोकतंत्र लाईं, फिर उसी लोकतंत्र को व्यक्तिगत दुश्मनी से जकड़ लिया।

एक नज़र की खबर

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