नई दिल्ली/पटना: वेदांता ग्रुप के संस्थापक और चेयरमैन अनिल अग्रवाल पर व्यक्तिगत जीवन का सबसे बड़ा संकट आ पड़ा है। उनके इकलौते बेटे अग्निवेश अग्रवाल (49 वर्ष) का 7 जनवरी 2026 को अमेरिका में अचानक निधन हो गया। स्कीइंग दुर्घटना में घायल होने के बाद न्यूयॉर्क के माउंट सिनाई अस्पताल में रिकवरी के दौरान उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया, जिससे उनकी मौत हो गई। अनिल अग्रवाल ने इसे अपने जीवन का “सबसे अंधेरा दिन” बताया और दुख की इस घड़ी में बेटे से किया पुराना वादा दोहराया – अपनी कमाई का 75% से अधिक हिस्सा समाज को दान करने का।
अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “मैंने अग्नि (अग्निवेश का निकनेम) से वादा किया था कि हम जो कमाएं, उसका 75% से ज्यादा समाज को वापस देंगे। आज मैं उस वादे को नवीनीकृत करता हूं और और भी सादा जीवन जीने का संकल्प लेता हूं।” यह दान शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और युवाओं के रोजगार जैसे क्षेत्रों में लगेगा। फोर्ब्स के अनुसार, अनिल अग्रवाल की नेटवर्थ करीब 4.2 अरब डॉलर (लगभग 35,000 करोड़ रुपये) है, यानी 75% दान का मतलब 26,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि समाज सेवा में जाएगी।
बेटे अग्निवेश अग्रवाल की मौत की पूरी कहानी
- अग्निवेश अग्रवाल का जन्म 3 जून 1976 को पटना में हुआ था।
- वे मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े, मेयो कॉलेज (अजमेर) से पढ़ाई की।
- बाद में उन्होंने फुजैराह गोल्ड कंपनी स्थापित की और हिंदुस्तान जिंक के चेयरमैन बने।
- अमेरिका में स्कीइंग के दौरान दुर्घटना हुई, इलाज चल रहा था लेकिन अचानक कार्डियक अरेस्ट से निधन।
- अनिल अग्रवाल ने पोस्ट में लिखा, “वह स्वस्थ थे, जीवन और सपनों से भरे हुए। हम सोच रहे थे कि सबसे बुरा दौर गुजर गया, लेकिन नियति ने कुछ और लिखा था।”
यह निधन भारतीय कारोबारी जगत के लिए बड़ा झटका है। वेदांता परिवार ने इसे “गहरा दुख” बताया और अग्निवेश को दयालु नेता व समर्पित बेटा कहा।
75% संपत्ति दान का संकल्प क्यों?
- यह वादा नया नहीं है। अनिल और अग्निवेश अक्सर चर्चा करते थे कि धन का उद्देश्य समाज सेवा होना चाहिए।
- मुख्य फोकस: कोई बच्चा भूखा न रहे, हर बच्चे को शिक्षा मिले, महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हों और युवाओं को अर्थपूर्ण रोजगार।
- अनिल अग्रवाल ने कहा, “अग्नि का सपना आत्मनिर्भर भारत का था। उनकी विरासत उन लोगों की जिंदगियों में जीवित रहेगी जिन्हें हम छुएंगे।”
बिहार के छोटे शहर से मेटल किंग बनने की प्रेरक कहानी
अनिल अग्रवाल की सफलता की कहानी रैग्स-टू-रिचेस की मिसाल है:
- जन्म: 24 जनवरी 1954 को पटना (बिहार) में मारवाड़ी परिवार में।
- पिता द्वारका प्रसाद अग्रवाल का छोटा एल्यूमिनियम कंडक्टर का बिजनेस था।
- स्कूलिंग: पटना के मिलर हाई स्कूल से।
- 19 साल की उम्र में मुंबई चले गए, सिर्फ टिफिन और बिस्तर लेकर।
- शुरुआत: स्क्रैप मेटल का व्यापार। केबल कंपनियों से पुराना माल इकट्ठा कर मुंबई में बेचते थे।
- 1976 में वेदांता ग्रुप की नींव रखी (तब शमशेर स्टर्लिंग कंपनी खरीदी)।
- 1986 में स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज शुरू की, फिर वेदांता रिसोर्सेज लिमिटेड बनाई।
- आज वेदांता दुनिया की प्रमुख माइनिंग और मेटल कंपनियों में शुमार है – जिंक, एल्यूमिनियम, ऑयल आदि में लीडर।
- अनिल अग्रवाल को “मेटल किंग” कहा जाता है। वे लंदन में रहते हैं, लेकिन भारत से गहरा जुड़ाव रखते हैं।
अनिल की यह यात्रा संघर्ष, दृढ़ता और सपनों की उड़ान की मिसाल है। बिहार जैसे राज्य से निकलकर ग्लोबल बिजनेस टाइकून बनना लाखों युवाओं को प्रेरित करता है।
प्रतिक्रियाएं और प्रभाव
- उद्योग जगत से सहानुभूति की बाढ़: कई सीईओ और नेता शोक संदेश भेज रहे हैं।
- वेदांता कर्मचारी उन्हें “विस्तारित परिवार” मानते हैं।
- यह घटना कारोबारी दुनिया में धन, विरासत और परोपकार पर नई बहस छेड़ रही है।
अनिल अग्रवाल ने दुख को ताकत में बदलते हुए समाज सेवा का संकल्प लिया है। उनकी यह कहानी बताती है कि सफलता का असली मतलब दूसरों की जिंदगी बेहतर बनाना है। शोक की इस घड़ी में अनिल अग्रवाल और उनके परिवार के साथ पूरा देश खड़ा है।


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