भारत में मनरेगा (MGNREGA) को लेकर लंबे समय से एक बड़ा विवाद चल रहा है: क्या यह योजना ग्रामीण मजदूरों को खेती से दूर करके कृषि में मजदूरों की कमी पैदा कर रही है? किसान संगठन और कुछ नेता दावा करते हैं कि मनरेगा की गारंटीड मजदूरी और काम की वजह से पीक सीजन (बुआई-कटाई) में मजदूर नहीं मिलते, जिससे मजदूरी बढ़ती है और किसानों की लागत बढ़ जाती है। लेकिन हालिया आंकड़े और अध्ययन इस दावे को काफी हद तक मिथक बताते हैं। दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने मनरेगा को रिप्लेस करने के लिए विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड अजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल (VB-G RAM G Bill) पेश किया, जिसमें पीक एग्रीकल्चर सीजन में 60 दिनों तक योजना रोकने का प्रावधान है – यानी सरकार भी इस “कमी” की शिकायत को गंभीरता से ले रही है। आइए 2024-2025 के ताजा आंकड़ों, अध्ययनों और न्यूज से पूरी सच्चाई समझते हैं।
विवाद की जड़: मनरेगा और कृषि मजदूर कमी का दावा
- मनरेगा 2005 में शुरू हुई, जो ग्रामीण परिवारों को सालाना 100 दिन (अब प्रस्तावित 125 दिन) का गारंटीड अकुशल काम देती है।
- शुरुआत से ही किसान संगठनों ने शिकायत की कि यह योजना मजदूरों को खेती से खींच रही है। पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने 2010 में मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर पीक सीजन में 3 महीने रोकने की मांग की थी।
- 2025 में VB-G RAM G बिल में 60 दिनों की रोक का प्रावधान इसी शिकायत को संबोधित करता है। सरकार का तर्क: इससे खेती में मजदूर उपलब्ध रहेंगे, कृत्रिम मजदूरी वृद्धि रुकेगी और खाद्य कीमतें नियंत्रित रहेंगी।
- FY 2024-25 में मनरेगा पर खर्च ₹1.04 लाख करोड़ था, 5.78 करोड़ परिवारों (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) ने लाभ लिया। औसत काम: सिर्फ 50-51 दिन प्रति परिवार।
आंकड़े क्या कहते हैं? मजदूर कमी का सबूत कमजोर
ताजा रिपोर्ट्स (दिसंबर 2025) से साफ है कि मनरेगा से खेती में बड़ी कमी नहीं हुई:
- कृषि मजदूरी वृद्धि और इन्फ्लेशन:
- पिछले 10 साल (2014-2024) में कृषि मजदूरी की नाममात्र वृद्धि इन्फ्लेशन के साथ-साथ रही, कोई बड़ा उछाल नहीं।
- कृषि मजदूरी कुल ग्रामीण मजदूरी से ज्यादा बढ़ी, लेकिन रियल टर्म्स में स्थिर या घटी।
- वजह: ग्रामीण महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ी (LFPR में वृद्धि), जिससे कुल श्रम आपूर्ति बढ़ी और मजदूरी पर दबाव कम हुआ।
- निष्कर्ष: मनरेगा से मजदूरों की “बर्गेनिंग पावर” बढ़ी, लेकिन व्यापक कमी या मजदूरी में भारी उछाल नहीं।
- कृषि कार्यबल में बदलाव (PLFS डेटा):
- PLFS 2023-24 (जुलाई 2023-जून 2024) और मासिक बुलेटिन (2025) से: कृषि में कार्यबल का हिस्सा स्थिर या मौसमी बदलाव।
- ग्रामीण क्षेत्रों में प्राइमरी सेक्टर (कृषि) से सेकेंडरी/सर्विसेज में शिफ्ट, लेकिन कुल कमी नहीं।
- महिलाओं की कृषि में भागीदारी बढ़ी, जो मनरेगा से खींचे गए मजदूरों की भरपाई करती है।
- 2025 मासिक डेटा: गर्मी और मौसम की वजह से कृषि काम में गिरावट, लेकिन मनरेगा मुख्य कारण नहीं।
- मनरेगा डिमांड और उपलब्धता:
- 2024-25 में रजिस्ट्रेशन 8.6% बढ़े, लेकिन काम सृजन 7.1% घटा। औसत दिन: 50 के करीब।
- RBI रिपोर्ट (2024): मनरेगा डिमांड कम होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार का संकेत (कम डिस्ट्रेस)।
- सिर्फ 7% परिवारों को पूरे 100 दिन मिले। कई राज्यों में बजट कमी और पेमेंट डिले से काम कम।
- निष्कर्ष: अगर मनरेगा से मजदूर खेती छोड़ रहे होते, तो डिमांड ज्यादा होती – लेकिन उलटा हो रहा है।
- कृषि उत्पादन पर असर:
- मनरेगा शुरू होने के बाद अनाज उत्पादन और यील्ड बढ़े।
- योजना से बने एसेट्स (तालाब, सिंचाई) ने उत्पादकता बढ़ाई।
- कोई बड़ा अध्ययन (2023-2025) उत्पादन गिरावट नहीं दिखाता।
दोनों पक्षों के तर्क
- हाँ, कमी हुई (किसानों का पक्ष):
- पीक सीजन में स्थानीय स्तर पर दिक्कत: मजदूर मनरेगा या बेहतर विकल्प चुनते हैं।
- कुछ अध्ययन (पुराने): पुरुष मजदूरों की कमी, कृषि का फेमिनाइजेशन।
- VB-G RAM G बिल इसी को संबोधित करता है।
- नहीं, यह मिथक है (आंकड़े और विशेषज्ञों का पक्ष):
- मुख्य कारण: मशीनीकरण, शहरों की ओर पलायन, बेहतर गैर-कृषि काम।
- महिलाओं की बढ़ी भागीदारी ने कमी की भरपाई की।
- मजदूरी वृद्धि मुख्यत: ऑफ-सीजन में मनरेगा का असर, पीक में कम।
- इंडियन एक्सप्रेस (दिसंबर 2025): “मनरेगा से व्यापक कमी के सबूत कमजोर।”
नई योजना VB-G RAM G बिल की मुख्य बदलाव (2025)
- 100 दिन से 125 दिन काम।
- पीक सीजन में 60 दिन रोक (राज्य तय करेंगे)।
- साप्ताहिक पेमेंट, फोकस पानी सुरक्षा और इंफ्रा पर।
- फंडिंग: राज्य बोझ बढ़ेगा (लगभग ₹30,000 करोड़ अतिरिक्त)।
- अप्रैल 2026 से लागू होने की संभावना।
पूरी सच्चाई
2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि मनरेगा ने ग्रामीण गरीबों (खासकर महिलाओं) की आय बढ़ाई, पलायन कम किया और मजदूरी में संतुलन लाया। कुछ स्थानीय/मौसमी दिक्कतें जरूर हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर खेती से मजदूरों का पलायन या उत्पादन गिरावट नहीं हुई। “मजदूर कमी” का दावा काफी हद तक परसेप्शन है – असल कारण मशीनीकरण और आर्थिक बदलाव हैं। नई बिल से शायद पीक सीजन की समस्या कम हो, लेकिन मनरेगा की मूल भावना (डिमांड-ड्रिवन गरीबी उन्मूलन) कमजोर न हो, यह देखना बाकी है।


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